Such a lie! Sunday Motivational Story Special.

Today’s Sunday story Special
Such a lie!

“Amma!. Your son has sent a money order.”
The postman Babu stopped his cycle on seeing Amma.  Taking off the glasses on her eyes, cleaning them from the lap and wearing them back, suddenly there was a gleam in the old eyes of Amma.
“Son!. Let me talk first.”
Amma looked at him with hopeful eyes but she tried to avoid Amma.
“Amma!. I don’t have that much time. I can get you to talk to your son every time.”
The postman tried to tell Amma his haste but Amma started chirping him.
“Son!. It’s only a matter of time.”
“Amma, don’t you insist on talking to me every time!”
Saying this, the postman started dialing a number on his mobile before placing the money in Amma’s hand.
“Take Amma!. Talk but don’t talk too much. Money is deducted.”
He handed over his mobile in Amma’s hand.  A smile appeared on his wrinkled face.

“There’s a whole thousand rupees, Amma!”
Saying this, the postman handed over ten hundred notes to Amma.
Counting the money in her hand, Amma gestured for her to stay.
“What happened now Amma?”
“Keep this hundred rupees, son!”
“Why Amma?”  She wondered.
“Apart from delivering money every month, you also get my son to talk to me, something must have been spent, wouldn’t it!”
“Oh no Amma!. Let it be.”
He kept on refusing lakhs but Amma forcefully put a hundred rupees in his fist and he turned to go back from there.
Amma, who was alone in her house, also went inside her home giving her many blessings.
The postman had just moved a few steps from there that someone put a hand on his shoulder.
When he looked back, a face of his acquaintance was standing in front of him in that town.
He was surprised to find Rampravesh, who runs a mobile phone shop, in front.
“Brother, how are you here?. You are still at your shop, aren’t you?”
“I came here to meet someone!.But I want to ask you something.”
Rampravesh’s eyes were fixed on the postman’s face.
“Ask me brother!”
“Brother!.Why do you do this every month?”
“What have I done, brother?”
Facing the questioning eyes of Rampravesh, the postman got a little nervous.
“Every month you also give money to this Amma from your pocket and give me money to talk to her on the phone as her son!. Why so?”
The postman was stunned for a while after hearing the question of Rampravesh.
It was as if suddenly he had been caught with a big lie, but the very next moment he clarified.
“I don’t give money to them! I give it to my mother.”
“I did not understand?”
Rampravesh was surprised to hear about that postman but the postman started telling further…
“His son had gone somewhere outside to earn money and every month he used to send a money order of thousand rupees to his Amma, but one day instead of the money order, a letter from a friend of his son came in the name of Amma.”
* Rampravesh got curious while listening to that postman.
“How the letter?. What was written in that letter?”
“His son lost his life in the city due to corona infection!. He is no more.”
“Then what happened brother?”
Rampravesh’s curiosity doubled but the postman fulfilled his point.
“I didn’t have the courage to tell this Amma, who waits a few rupees every month and expects son’s well-being!. I get her money order every month on my behalf.”
“But that’s not your mother, is it?”
“I also used to send thousand rupees every month to my Amma!. But now where is my Amma too.”  Saying this the postman’s eyes filled with tears.
Taking money from her every month, Rampravesh, who talked to Amma as her son, was speechless after seeing the spiritual affection of that postman for a stranger Amma.

All the living beings who have become happy are happy by sacrificing passion and not by fulfillment of passion, because the fulfillment of passion is done by virtue and there is no virtue to fulfill all the desires of even a living being in the world, so it is not in the fulfillment of passion.  There is wisdom in renunciation.  We get to learn such infinite teachings by staying with our gurus, we all should be happy by learning such art by staying close to the true God Shastra Guru and by lack of materiality.
Jai Jinendra

आज की कहानी
एक झूठ ऐसा भी

“अम्मा!.आपके बेटे ने मनीआर्डर भेजा है।”
डाकिया बाबू ने अम्मा को देखते अपनी साईकिल रोक दी। अपने आंखों पर चढ़े चश्मे को उतार आंचल से साफ कर वापस पहनती अम्मा की बूढ़ी आंखों में अचानक एक चमक सी आ गई..
“बेटा!.पहले जरा बात करवा दो।”
अम्मा ने उम्मीद भरी निगाहों से उसकी ओर देखा लेकिन उसने अम्मा को टालना चाहा..
“अम्मा!. इतना टाइम नहीं रहता है मेरे पास कि,. हर बार आपके बेटे से आपकी बात करवा सकूं।”
डाकिए ने अम्मा को अपनी जल्दबाजी बताना चाहा लेकिन अम्मा उससे चिरौरी करने लगी..
“बेटा!.बस थोड़ी देर की ही तो बात है।”
“अम्मा आप मुझसे हर बार बात करवाने की जिद ना किया करो!”
यह कहते हुए वह डाकिया रुपए अम्मा के हाथ में रखने से पहले अपने मोबाइल पर कोई नंबर डायल करने लगा..
“लो अम्मा!.बात कर लो लेकिन ज्यादा बात मत करना,.पैसे कटते हैं।”
उसने अपना मोबाइल अम्मा के हाथ में थमा दिया उसके हाथ से मोबाइल ले फोन पर बेटे से हाल-चाल लेती अम्मा मिनट भर बात कर ही संतुष्ट हो गई। उनके झुर्रीदार चेहरे पर मुस्कान छा गई।

“पूरे हजार रुपए हैं अम्मा!”
यह कहते हुए उस डाकिया ने सौ-सौ के दस नोट अम्मा की ओर बढ़ा दिए।
रुपए हाथ में ले गिनती करती अम्मा ने उसे ठहरने का इशारा किया..
“अब क्या हुआ अम्मा?”
“यह सौ रुपए रख लो बेटा!”
“क्यों अम्मा?” उसे आश्चर्य हुआ।
“हर महीने रुपए पहुंचाने के साथ-साथ तुम मेरे बेटे से मेरी बात भी करवा देते हो,.कुछ तो खर्चा होता होगा ना!”
“अरे नहीं अम्मा!.रहने दीजिए।”
वह लाख मना करता रहा लेकिन अम्मा ने जबरदस्ती उसकी मुट्ठी में सौ रुपए थमा दिए और वह वहां से वापस जाने को मुड़ गया।
अपने घर में अकेली रहने वाली अम्मा भी उसे ढेरों आशीर्वाद देती अपनी देहरी के भीतर चली गई।
वह डाकिया अभी कुछ कदम ही वहां से आगे बढ़ा था कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा..
उसने पीछे मुड़कर देखा तो उस कस्बे में उसके जान पहचान का एक चेहरा सामने खड़ा था।
मोबाइल फोन की दुकान चलाने वाले रामप्रवेश को सामने पाकर वह हैरान हुआ..
“भाई साहब आप यहां कैसे?. आप तो अभी अपनी दुकान पर होते हैं ना?”
“मैं यहां किसी से मिलने आया था!.लेकिन मुझे आपसे कुछ पूछना है।”
रामप्रवेश की निगाहें उस डाकिए के चेहरे पर टिक गई..
“जी पूछिए भाई साहब!”
“भाई!.आप हर महीने ऐसा क्यों करते हैं?”
“मैंने क्या किया है भाई साहब?”
रामप्रवेश के सवालिया निगाहों का सामना करता वह डाकिया तनिक घबरा गया।
“हर महीने आप इस अम्मा को अपनी जेब से रुपए भी देते हैं और मुझे फोन पर इनसे इनका बेटा बन कर बात करने के लिए भी रुपए देते हैं!.ऐसा क्यों?”
रामप्रवेश का सवाल सुनकर डाकिया थोड़ी देर के लिए सकपका गया!.
मानो अचानक उसका कोई बहुत बड़ा झूठ पकड़ा गया हो लेकिन अगले ही पल उसने सफाई दी..
“मैं रुपए इन्हें नहीं!.अपनी अम्मा को देता हूंँ।”
“मैं समझा नहीं?”
उस डाकिया की बात सुनकर रामप्रवेश हैरान हुआ लेकिन डाकिया आगे बताने लगा…
“इनका बेटा कहीं बाहर कमाने गया था और हर महीने अपनी अम्मा के लिए हजार रुपए का मनी ऑर्डर भेजता था लेकिन एक दिन मनी ऑर्डर की जगह इनके बेटे के एक दोस्त की चिट्ठी अम्मा के नाम आई थी।”*
*उस डाकिए की बात सुनते रामप्रवेश को जिज्ञासा हुई..
“कैसे चिट्ठी?.क्या लिखा था उस चिट्ठी में?”
“कोरोना संक्रमण की वजह से उनके बेटे की शहर में जान चली गई!. अब वह नहीं रहा।”
“फिर क्या हुआ भाई?”
रामप्रवेश की जिज्ञासा दुगनी हो गई लेकिन डाकिए ने अपनी बात पूरी की..
“हर महीने चंद रुपयों का इंतजार और बेटे की कुशलता की उम्मीद करने वाली इस अम्मा को यह बताने की मेरी हिम्मत नहीं हुई!.मैं हर महीने अपनी तरफ से इनका मनीआर्डर ले आता हूंँ।”
“लेकिन यह तो आपकी अम्मा नहीं है ना?”
“मैं भी हर महीने हजार रुपए भेजता था अपनी अम्मा को!. लेकिन अब मेरी अम्मा भी कहां रही।” यह कहते हुए उस डाकिया की आंखें भर आई।
हर महीने उससे रुपए ले, अम्मा से उनका बेटा बनकर बात करने वाला रामप्रवेश, उस डाकिये का एक अजनबी अम्मा के प्रति आत्मिक स्नेह देख नि:शब्द रह गया।

जितने भी जीव सुखी हुए हैं वह राग को त्याग कर सुखी हुए हैं राग पूर्ति से नहीं क्योंकि राग की पूर्ति तो पुण्य से होती है और संसार में एक जीव की भी सारी इच्छाएं पूरी करने लायक भी पुण्य नहीं इसलिए राग की पूर्ति में नहीं राग के त्याग में ही समझदारी है। ऐसी अनंत शिक्षाएं हमारे गुरुओ के पास रहकर हमें सीखने मिलती हैं हम सब भी सच्चे देव शास्त्र गुरु के निकट रहकर ऐसी कला अपने जीवन में उतार कर सीखकर भव का अभाव कर सुखी हो
जय जिनेन्द्र

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